लखनऊ में सहभोज के बहाने जुटे BJP के 40 ब्राह्मण विधायक, पीएन पाठक के आवास पर बैठक से बढ़ी सियासी हलचल

लखनऊ में सहभोज के बहाने जुटे BJP के 40 ब्राह्मण विधायक, पीएन पाठक के आवास पर बैठक से बढ़ी सियासी हलचल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी हलचल तेज हो गई है। राजधानी लखनऊ में मंगलवार शाम सहभोज के बहाने बीजेपी के करीब 40 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी एक साथ जुटे, जिसके बाद सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह सहभोज कुशीनगर से बीजेपी विधायक पीएन पाठक के सरकारी आवास पर आयोजित किया गया, लेकिन इसे सिर्फ एक सामाजिक कार्यक्रम मानने को कई राजनीतिक विश्लेषक तैयार नहीं हैं।

खास बात यह है कि यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा है और 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर रणनीतिक हलचलें तेज हो चुकी हैं। ऐसे में ब्राह्मण विधायकों का इस तरह एकजुट होना बीजेपी के लिए एक नया सियासी संकेत माना जा रहा है।

सहभोज या सियासी बैठक?

कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर “सहभोज” का नाम दिया गया था, लेकिन जिस तरह से बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायक और विधान परिषद सदस्य (MLC) इसमें शामिल हुए, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान लिट्टी-चोखा और मंगलवार व्रत का फलाहार परोसा गया, लेकिन खाने के साथ-साथ कई अहम राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

इस सहभोज में पूर्व प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव रह चुके नृपेंद्र मिश्र के बेटे और एमएलसी साकेत मिश्र की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और भी सियासी रंग दे दिया। माना जा रहा है कि पार्टी के भीतर ब्राह्मण नेताओं की भूमिका, संगठन में हिस्सेदारी और आगामी चुनावों में टिकट वितरण जैसे मुद्दों पर अनौपचारिक बातचीत हुई।

ब्राह्मण विधायकों के एकजुट होने से क्यों बढ़ी चिंता?

बीजेपी के भीतर इस तरह के जातिगत समूहों का एकजुट होना पहली बार नहीं है। इससे पहले मानसून सत्र के दौरान ठाकुर विधायकों की एकजुटता ने भी सियासी हलचल पैदा की थी। अब ब्राह्मण विधायकों का इस तरह साथ आना यह संकेत देता है कि पार्टी के अंदर असंतोष धीरे-धीरे सतह पर आ रहा है

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम बीजेपी के लिए चेतावनी की घंटी हो सकता है। यदि अलग-अलग सामाजिक समूहों के विधायक इसी तरह अपने-अपने स्तर पर एकजुट होने लगे, तो इसका असर पार्टी की एकजुटता और चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।

किन विधायकों की रही मौजूदगी?

पीएन पाठक के आवास पर हुए इस सहभोज कार्यक्रम में कई बड़े और प्रभावशाली नाम शामिल रहे। इनमें—

  • रत्नाकर मिश्र
  • उमेश द्विवेदी (MLC)
  • प्रकाश द्विवेदी
  • रमेश मिश्र
  • शलभमणि त्रिपाठी
  • विपुल दूबे
  • राकेश गोस्वामी
  • रवि शर्मा
  • विनोद चतुर्वेदी
  • संजय शर्मा
  • विवेकानंद पाण्डेय

इसके अलावा अनिल त्रिपाठी, अंकुर राज तिवारी, साकेत मिश्र, बाबूलाल तिवारी (MLC), विनय द्विवेदी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पाराशर, कैलाशनाथ शुक्ला, प्रेमनारायण पाण्डेय, ज्ञान तिवारी, सुनील दत्त द्विवेदी और धर्मेंद्र सिंह भूमिहार (MLC) भी इस कार्यक्रम में मौजूद रहे। कुल मिलाकर करीब 40 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी इस सहभोज में शामिल हुए।

पार्टी के भीतर पक रही सियासी खिचड़ी?

इस घटनाक्रम के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि बीजेपी के अंदर ही अंदर कुछ खिचड़ी पक रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के अलग-अलग सामाजिक समूह अपनी भूमिका और हिस्सेदारी को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते पार्टी नेतृत्व ने इन संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में यह असंतोष खुलकर सामने आ सकता है। ऐसे हालात में विपक्ष को भी बीजेपी को घेरने का मौका मिल सकता है।

योगी सरकार और बीजेपी आलाकमान के लिए चुनौती

पहले ठाकुर विधायकों और अब ब्राह्मण विधायकों की इस तरह की एकजुटता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी आलाकमान की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सभी सामाजिक वर्गों और नेताओं को साथ लेकर चले।

राजनीतिक विश्लेषकों का साफ कहना है कि 2027 से पहले पार्टी को अंदरूनी मतभेदों को सुलझाना होगा, वरना इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। बीजेपी की अब तक की सबसे बड़ी ताकत उसकी संगठनात्मक एकता रही है, और यदि इसमें दरार पड़ी, तो नुकसान तय माना जा रहा है।

निष्कर्ष

लखनऊ में हुआ यह सहभोज भले ही औपचारिक तौर पर एक सामाजिक कार्यक्रम बताया जा रहा हो, लेकिन इसके सियासी मायने गहरे हैं। बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों का एक मंच पर आना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर मंथन चल रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस संदेश को कैसे लेता है और क्या समय रहते हालात को संभाल पाता है या नहीं।

एक बात तय है—उत्तर प्रदेश की राजनीति में सियासी हलचल अभी थमने वाली नहीं है।

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