Bangladesh Elections 2025: बांग्लादेश में अगले साल फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो चुकी है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन, साठगांठ और समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। इसी बीच एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति बल्कि भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, बांग्लादेश की दो चर्चित और भारत विरोधी मानी जाने वाली पार्टियां—जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP)—एक-दूसरे के करीब आ गई हैं। दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। खास बात यह है कि यह सियासी हलचल ऐसे वक्त तेज हुई है, जब बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान की वापसी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं।
फरवरी चुनाव और बदले-बदले सियासी हालात
बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले चुनाव को इस बार बेहद अहम माना जा रहा है। सत्तारूढ़ अवामी लीग के सामने विपक्षी दल खुद को मजबूत करने में जुटे हैं। इसी कड़ी में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) एक बार फिर केंद्र में आ गई है।
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान की संभावित वापसी को विपक्ष के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। तारिक रहमान के राजनीतिक रूप से सक्रिय होते ही बाकी दलों में भी हलचल तेज हो गई है और नए-नए गठबंधनों की जमीन तैयार हो रही है।
जमात और NCP की नजदीकियां
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के बीच गठबंधन लगभग तय हो चुका है। फिलहाल दोनों पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत चल रही है।
इन दोनों दलों की पहचान लंबे समय से भारत विरोधी रुख को लेकर रही है। यही वजह है कि इनके संभावित गठबंधन को क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
भारत विरोध क्यों अहम मुद्दा?
▶ जमात-ए-इस्लामी
जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश में अक्सर पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी संगठन के तौर पर देखा जाता है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात की भूमिका को लेकर आज भी विवाद बना रहता है।
▶ नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP)
NCP का गठन पिछले साल शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए छात्र आंदोलनों से निकले नेताओं ने किया था। पार्टी के कई नेता सार्वजनिक मंचों से भारत विरोधी बयानबाजी करते रहे हैं।
यही वजह है कि इन दोनों दलों का एक मंच पर आना नई सियासी बहस को जन्म दे रहा है।
BNP से क्यों नहीं बनी बात?
अखबार प्रोथोम आलो की रिपोर्ट के मुताबिक, NCP शुरू से ही किसी बड़ी और पुरानी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ना चाहती थी। इसके लिए पहले BNP से बातचीत शुरू की गई, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई।
बताया जा रहा है कि NCP ज्यादा सीटों की मांग कर रही थी, जिसे लेकर BNP बैकफुट पर थी। इसी वजह से NCP ने जमात-ए-इस्लामी से संपर्क साधा और यहां बातचीत अपेक्षाकृत आगे बढ़ती दिखी।
NCP के भीतर भी मतभेद
हालांकि NCP के भीतर इस गठबंधन को लेकर एक राय नहीं है। पार्टी का एक धड़ा जमात के साथ जाने के खिलाफ है।
इस गुट का मानना है कि तारिक रहमान के बांग्लादेश लौटने के बाद BNP के साथ दोबारा बातचीत की जानी चाहिए, क्योंकि BNP देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और उसके साथ गठबंधन चुनावी लिहाज से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।
सीट शेयरिंग पर बनी सहमति
सूत्रों के मुताबिक, NCP और जमात के बीच सीट बंटवारे को लेकर मोटे तौर पर सहमति बन गई है।
- NCP ने शुरुआत में 50 सीटों की मांग की थी
- लेकिन बातचीत के बाद पार्टी 30 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हो गई
- बाकी सीटों पर NCP अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी और जमात के उम्मीदवारों का समर्थन करेगी
यह समझौता दोनों दलों के लिए रणनीतिक माना जा रहा है।
पहले भी बना था गठबंधन
गौरतलब है कि इससे पहले 7 दिसंबर को NCP ने
- अमर बांग्लादेश पार्टी
- बांग्लादेश स्टेट रिफॉर्म मूवमेंट
के साथ मिलकर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म अलायंस के नाम से गठबंधन बनाया था। लेकिन यह गठबंधन सीमित दायरे तक ही असरदार माना जा रहा था। अब NCP की नजर बड़े दल—BNP या जमात—के साथ समझौते पर है।
भारत के लिए क्या मायने?
बांग्लादेश की राजनीति में भारत एक बड़ा फैक्टर रहा है। अगर भारत विरोधी दल मजबूत होकर चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो इसका असर भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि विदेश नीति और क्षेत्रीय संतुलन की दिशा भी तय करेगा।
निष्कर्ष
बांग्लादेश का आगामी चुनाव सिर्फ एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक विचारधाराओं और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की जंग बनता जा रहा है। तारिक रहमान की वापसी, भारत विरोधी दलों का एकजुट होना और विपक्षी गठबंधनों की उठापटक—ये सभी संकेत दे रहे हैं कि फरवरी का चुनाव बेहद रोचक और निर्णायक होगा।
अब देखना यह है कि BNP किस रणनीति के साथ मैदान में उतरती है और जमात-NCP गठबंधन जनता के बीच कितना असर छोड़ पाता है।
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