भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री आसिफ ख्वाजा का एक बयान सुर्खियों में है। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान एक सवाल का जवाब देते हुए कहा—”अगर भारत के साथ पाकिस्तान का युद्ध होता है तो क्या सऊदी अरब हमारा साथ देगा?” इस सवाल पर उनका जवाब चौंकाने वाला था, जिसने पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को नई बहस में डाल दिया है।
आसिफ ख्वाजा ने क्या कहा?
रक्षा मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा और रक्षा के लिए किसी तीसरे देश पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने कहा:
“सऊदी अरब हमारा दोस्त है, रणनीतिक साझेदार है, लेकिन युद्ध की स्थिति में हर देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। हमें खुद पर भरोसा करना होगा, किसी और पर नहीं।”
सऊदी अरब-पाकिस्तान संबंधों का इतिहास
- पाकिस्तान और सऊदी अरब दशकों से करीबी सहयोगी रहे हैं।
- आर्थिक संकट के समय सऊदी ने पाकिस्तान को कई बार कर्ज और तेल की मदद दी है।
- पाकिस्तान की सेना और सऊदी सेना के बीच भी संयुक्त अभ्यास होते रहे हैं।
- लेकिन हाल के वर्षों में भारत और सऊदी अरब की नजदीकी भी बढ़ी है।
भारत-सऊदी रिश्तों में मजबूती
- भारत और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा, व्यापार और रक्षा क्षेत्र में संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं।
- प्रधानमंत्री मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच पिछले वर्षों में कई अहम समझौते हुए।
- सऊदी अरब भारत को अपना बड़ा रणनीतिक आर्थिक साझेदार मानता है।
पाकिस्तान के लिए संकेत
आसिफ ख्वाजा के बयान को पाकिस्तान के भीतर दो तरह से देखा जा रहा है:
- एक वर्ग का मानना है कि मंत्री ने यथार्थवादी स्थिति स्वीकार की है कि सऊदी अरब युद्ध में सीधे शामिल नहीं होगा।
- दूसरा वर्ग मानता है कि यह बयान पाकिस्तान की कूटनीतिक कमजोरी को उजागर करता है।
विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब जैसे देश सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
- सऊदी अरब की प्राथमिकता वैश्विक ऊर्जा बाजार और आर्थिक स्थिरता है।
- किसी भी युद्ध में शामिल होना उसके हितों को नुकसान पहुंचा सकता है।
- इसलिए पाकिस्तान को यह समझना होगा कि दोस्ताना रिश्ते और युद्ध में साथ देना, दोनों अलग बातें हैं।
निष्कर्ष
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का यह बयान साफ करता है कि भारत-पाक तनाव के बीच सऊदी अरब जैसे देशों पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। युद्ध की स्थिति में हर देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान के लिए यह एक कड़ा लेकिन जरूरी सबक है कि उसे अपनी सुरक्षा के लिए बाहरी मदद की बजाय अपनी क्षमता पर निर्भर रहना होगा।
















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