पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और प्रांतीय समुदायों पर हो रहे अत्याचार एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर हुए हैं। सिंधी नेताओं ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां उन्हें यातनाएं देती हैं, कई बार उनके प्रियजनों के जले हुए शव तक लौटाए जाते हैं। अब यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भी गूंज सकता है।
सिंधी नेता का दर्द
सिंधी नेता और कार्यकर्ता करीम बख्श सिंधी ने मीडिया के सामने बताया:
- उन्हें लगातार धमकियां मिलती रहती हैं।
- कई कार्यकर्ताओं को उठा लिया जाता है और फिर कभी उनकी लाश मिलती है, कभी जली हुई हालत में शव।
- पाकिस्तान सरकार हर बार “राष्ट्रीय सुरक्षा” का बहाना बनाकर इन मामलों को दबा देती है।
करीम का कहना है कि “हम सिर्फ अपने अधिकार मांगते हैं, लेकिन हमें देशद्रोही करार देकर प्रताड़ित किया जाता है।”
क्यों चर्चा में आया मामला?
- हाल ही में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से कई लापता कार्यकर्ताओं की लिस्ट सामने आई।
- सोशल मीडिया पर परिवारों के बयान वायरल हुए, जिनमें उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों पर हत्या और लापता करने के आरोप लगाए।
- इस मुद्दे को अब UNGA 2025 सत्र में उठाने की तैयारी हो रही है।
UNGA में उठेगा मुद्दा?
सूत्रों के अनुसार,
- यूरोप और एशिया के कई मानवाधिकार संगठन इस विषय पर ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार कर चुके हैं।
- रिपोर्ट में खासतौर पर सिंधी, बलूच और पश्तून कार्यकर्ताओं पर हो रहे जुल्म का जिक्र है।
- संभावना है कि UNGA के मंच से पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाएगा।
पाकिस्तान सरकार की सफाई
- पाकिस्तान सरकार का कहना है कि “देश में कोई मानवाधिकार उल्लंघन नहीं हो रहा है।”
- अधिकारियों ने दावा किया कि “लापता लोग अक्सर विदेश भाग जाते हैं या आतंकवादी संगठनों से जुड़ जाते हैं।”
- लेकिन स्थानीय लोगों और परिवारों का कहना है कि यह पूरी तरह से झूठा प्रचार है।
भारत और वैश्विक प्रतिक्रिया
- भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर अल्पसंख्यकों और अलगाववादी नेताओं के दमन का आरोप लगाता रहा है।
- अमेरिकी और यूरोपीय मानवाधिकार आयोग भी इस पर नजर बनाए हुए हैं।
- अगर यह मामला UNGA में उठता है, तो पाकिस्तान पर कड़े प्रस्ताव और निगरानी की मांग की जा सकती है।
निष्कर्ष
सिंधी नेताओं की आवाज अब स्थानीय दायरों से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुंच रही है। सवाल यह है कि क्या UNGA में उठने वाला यह मुद्दा पाकिस्तान सरकार को मानवाधिकार सुधार करने पर मजबूर करेगा, या फिर हमेशा की तरह सब कुछ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएगा।
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