ट्रंप के प्लान पर NATO की बड़ी चाल, 6 देशों की सेना पहुंची ग्रीनलैंड | Greenland Security News

ट्रंप के प्लान पर NATO की बड़ी चाल, 6 देशों की सेना पहुंची ग्रीनलैंड | Greenland Security News

Greenland Security: ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अचानक जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों के बाद अब NATO (नाटो) ने ऐसा कदम उठाया है, जिसे वैश्विक रणनीति की बड़ी चाल माना जा रहा है। डेनमार्क के अनुरोध पर नाटो के 6 देशों ने ग्रीनलैंड में अपनी सेना और सैन्य कर्मियों को तैनात करना शुरू कर दिया है, जिससे साफ है कि आने वाले दिनों में आर्कटिक क्षेत्र दुनिया की सबसे संवेदनशील रणनीतिक जमीन बन सकता है।

इन देशों में स्वीडन, नॉर्वे, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स और कनाडा शामिल हैं। हालांकि सैनिकों की संख्या सीमित है, लेकिन संदेश बेहद साफ है—ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर अब कोई भी एकतरफा दावा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

ग्रीनलैंड क्यों बन गया वैश्विक राजनीति का केंद्र?

ग्रीनलैंड भले ही बर्फ से ढका एक विशाल द्वीप हो, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत किसी सोने की खान से कम नहीं है।

  • यह आर्कटिक क्षेत्र का अहम हिस्सा है
  • यहां से उत्तरी अमेरिका और यूरोप दोनों पर नजर रखी जा सकती है
  • भविष्य में यहां नए समुद्री रास्ते, दुर्लभ खनिज संसाधन और सैन्य निगरानी के बड़े अवसर हैं

ग्रीनलैंड भले ही डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे सुपरपावर देशों की नजर में बेहद अहम बना देती है।

ट्रंप के बयान से क्यों भड़का विवाद?

डोनाल्ड ट्रंप पहले भी अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को “खरीदने” की बात कह चुके हैं। लेकिन अब एक बार फिर उन्होंने बयान दिया कि—

“ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। अगर जरूरत पड़ी तो उस पर कब्जा भी किया जा सकता है।”

ट्रंप का दावा है कि रूस और चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं और अगर अमेरिका ने समय रहते कदम नहीं उठाया, तो उसे बड़ा नुकसान हो सकता है।

यही बयान डेनमार्क और नाटो देशों के लिए खतरे की घंटी बन गया।

NATO की तुरंत कार्रवाई, डेनमार्क के समर्थन में एकजुटता

ट्रंप के बयान के बाद डेनमार्क ने अपने नाटो सहयोगियों से ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर मदद मांगी। इसके जवाब में नाटो ने बिना देरी किए वहां सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का फैसला किया।

यह साफ संकेत है कि नाटो ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी तरह की जबरदस्ती या एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ खड़ा है

स्वीडन और नॉर्वे ने की शुरुआत

सबसे पहले स्वीडन ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने का ऐलान किया।
स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने कहा—

“यह तैनाती डेनमार्क के अनुरोध पर की जा रही है और इसका मकसद आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है।”

इसके बाद नॉर्वे ने भी दो सैन्य कर्मियों को ग्रीनलैंड भेजने की पुष्टि की। नॉर्वे के रक्षा मंत्री ने कहा कि आर्कटिक की सुरक्षा नाटो की सामूहिक जिम्मेदारी है।

जर्मनी और फ्रांस भी मैदान में उतरे

जर्मनी ने 13 सैनिकों को एक विशेष टोही मिशन के तहत ग्रीनलैंड भेजने का फैसला किया है।
जर्मन सरकार के मुताबिक—

  • यह मिशन समुद्री निगरानी
  • और सुरक्षा ढांचे के आकलन के लिए है

वहीं फ्रांस ने भी पुष्टि की है कि उसके सैन्य कर्मी संयुक्त अभ्यास में हिस्सा लेंगे। फ्रांस का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कनाडा और नीदरलैंड्स की भागीदारी

कनाडा, जो खुद आर्कटिक क्षेत्र से जुड़ा देश है, उसने भी सीमित संख्या में सैन्य कर्मी भेजे हैं।
नीदरलैंड्स ने भी डेनमार्क के समर्थन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

इन सभी देशों की तैनाती से साफ है कि यह सिर्फ सैन्य कदम नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक संदेश भी है।

NATO

NATO का असली मकसद क्या है?

नाटो की इस तैनाती के पीछे तीन बड़े उद्देश्य माने जा रहे हैं—

1️⃣ रूस और चीन को संदेश

अगर आर्कटिक में किसी तरह की सैन्य या रणनीतिक हलचल होती है, तो नाटो पूरी तरह सतर्क है।

2️⃣ ट्रंप को कड़ा संकेत

ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोई भी कोशिश सीधे तौर पर नाटो के भीतर टकराव को जन्म दे सकती है।

3️⃣ प्रतीकात्मक एकजुटता

सैनिकों की संख्या कम है, लेकिन यह दिखाने के लिए काफी है कि डेनमार्क अकेला नहीं है।

नाटो के भीतर मतभेद अभी भी कायम

हालांकि सभी देश सुरक्षा पर एकमत दिख रहे हैं, लेकिन ट्रंप की सोच को लेकर नाटो के भीतर मतभेद साफ नजर आते हैं।

  • ट्रंप चाहते हैं कि नाटो अमेरिकी हितों के हिसाब से काम करे
  • जबकि डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देश साफ कह चुके हैं कि “ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो के नियमों के तहत सदस्य देश एक-दूसरे पर हमला नहीं कर सकते।”

आगे क्या बढ़ेगा तनाव?

विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • ग्रीनलैंड आने वाले समय में नई ‘कोल्ड वॉर’ का मैदान बन सकता है
  • आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और बढ़ सकती हैं
  • अमेरिका, नाटो, रूस और चीन के बीच रणनीतिक रस्साकशी तेज होगी

निष्कर्ष

ग्रीनलैंड को लेकर नाटो की यह कार्रवाई सिर्फ सैन्य तैनाती नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है।
ट्रंप के बयान ने जिस चिंगारी को हवा दी थी, अब वह अंतरराष्ट्रीय रणनीति की आग बनती नजर आ रही है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि
👉 क्या ट्रंप अपने बयान पर कायम रहते हैं?
👉 क्या अमेरिका नाटो से अलग राह अपनाता है?
👉 या फिर ग्रीनलैंड दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक जंग का केंद्र बन जाता है?

फिलहाल इतना तय है—ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ का टुकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की सबसे गर्म जमीन बन चुका है।

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