Tarique Rahman Return: बांग्लादेश की राजनीति में करीब 17 साल बाद एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने न सिर्फ ढाका बल्कि नई दिल्ली तक हलचल बढ़ा दी है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सर्वोच्च नेता बेगम खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान आखिरकार लंबे निर्वासन के बाद स्वदेश लौट आए हैं। उनकी वापसी को समर्थक जहां “राजनीतिक पुनर्जन्म” बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे बांग्लादेश की अस्थिर राजनीति के लिए एक नई चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
तारिक रहमान की वापसी ऐसे वक्त में हुई है, जब बांग्लादेश राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसक आंदोलनों और कट्टरपंथी ताकतों की बढ़ती सक्रियता से जूझ रहा है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के दौर में देश की विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो चुके हैं। ऐसे में ‘डार्क प्रिंस’ कहे जाने वाले तारिक रहमान की एंट्री ने सियासी पारा और चढ़ा दिया है।
ढाका में शक्ति प्रदर्शन, सड़कें समर्थकों से पटीं
तारिक रहमान का ढाका आगमन किसी वीआईपी रिटर्न से कम नहीं रहा। एयरपोर्ट से लेकर उनके आवास तक भव्य रोड शो निकाला गया। BNP का दावा है कि इस दौरान करीब 50 लाख समर्थक सड़कों पर उतरे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। स्थानीय मीडिया के मुताबिक, देश के अलग-अलग हिस्सों से समर्थकों को राजधानी लाने के लिए 10 विशेष ट्रेनें चलाई गईं, जिनसे लगभग 3 लाख लोग ढाका पहुंचे।
BNP ने इसे “ऐतिहासिक जनसमर्थन” करार दिया है, जबकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह शक्ति प्रदर्शन आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक संदेश देने की रणनीति का हिस्सा है।
क्यों अहम है तारिक रहमान की वापसी?
तारिक रहमान की वापसी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि—
- प्रो-इंडिया मानी जाने वाली आवामी लीग पर चुनाव लड़ने की रोक है
- पार्टी प्रमुख शेख हसीना सत्ता से बाहर हैं
- खालिदा जिया गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हैं
ऐसे में BNP की कमान व्यावहारिक तौर पर तारिक रहमान के हाथों में आती दिख रही है। समर्थकों को उम्मीद है कि वह पार्टी को नई दिशा देंगे और अगला चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी कराएंगे।
भारत के लिए क्यों है यह मामला संवेदनशील?
नई दिल्ली के लिए तारिक रहमान की वापसी दोहरी चिंता और उम्मीद दोनों लेकर आई है। भारत की सबसे बड़ी चिंता है जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता प्रभाव, जिसे पाकिस्तान की ISI का करीबी माना जाता है। शेख हसीना सरकार के दौरान जमात पर सख्ती थी, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद उसे फिर से राजनीतिक स्पेस मिला है।
भारत को राहत इस बात से है कि तारिक रहमान ने जमात से दूरी बनाते हुए साफ कहा है कि BNP चुनाव में उसके साथ गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने कट्टरपंथी राजनीति की आलोचना की और खुद को एक उदार, राष्ट्रवादी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है।
चुनावी समीकरण और जमात की चुनौती
हालिया सर्वे बताते हैं कि आने वाले चुनावों में BNP सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी उसे कड़ी टक्कर दे रही है। खासकर तब, जब जमात की छात्र इकाई ने ढाका यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में अप्रत्याशित जीत दर्ज की है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर BNP और जमात के बीच टकराव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर चुनावी माहौल और देश की स्थिरता पर पड़ सकता है।
‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति और यूनुस सरकार से मतभेद
तारिक रहमान ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि अंतरिम सरकार को दीर्घकालिक विदेश नीति के फैसले नहीं लेने चाहिए।
लंदन में रहते हुए उन्होंने जिस ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति की बात की थी, उसने अंतरराष्ट्रीय हलकों में भी चर्चा बटोरी। उनका नारा—
“न दिल्ली, न पिंडी, बांग्लादेश सबसे पहले”
इससे साफ है कि BNP न तो भारत और न ही पाकिस्तान के प्रभाव में आने की नीति अपनाना चाहती है। हालांकि, भारत को उम्मीद है कि सत्ता में आने पर BNP व्यावहारिक और संतुलित विदेश नीति अपनाएगी।
भारत-BNP रिश्तों में नरमी के संकेत
हाल ही में 1 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से खालिदा जिया के स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई और भारत की ओर से सहयोग की पेशकश की। इसके जवाब में BNP ने धन्यवाद दिया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वर्षों से तनावपूर्ण रहे भारत-BNP रिश्तों में दुर्लभ सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
कौन हैं ‘डार्क प्रिंस’ तारिक रहमान?
तारिक रहमान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं। 2001–06 के BNP शासनकाल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे। 2008 में ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट श्रृंखला में उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ कहा गया।
- 2007 में भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तारी
- हिरासत में प्रताड़ना और गंभीर बीमारी के आरोप
- 2008 में जमानत, इलाज के लिए लंदन रवाना
- 2004 के ढाका ग्रेनेड हमले में गैरहाजिरी में सजा
हालांकि, पिछले एक साल में अदालतों ने उन्हें सभी बड़े मामलों से बरी कर दिया है, जिसे BNP ने “राजनीतिक बदले की समाप्ति” बताया है।
निष्कर्ष
तारिक रहमान की वापसी ने बांग्लादेश की राजनीति में नया अध्याय खोल दिया है। यह वापसी जहां BNP के लिए संजीवनी साबित हो सकती है, वहीं भारत के लिए यह उम्मीद और खतरे के बीच की घंटी है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि—
- क्या तारिक रहमान कट्टरपंथी ताकतों को किनारे कर पाएंगे?
- क्या BNP सत्ता में आकर भारत-बांग्लादेश रिश्तों को नई दिशा देगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले चुनाव और बांग्लादेश के राजनीतिक भविष्य में छिपे हैं।
















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